जवाब देती कहानी
बच्चों के लिए कहानियां सुनने- सुनाने के कम होते सिलसिले के बीच कहानी सुनाने की परंपरा को नए रंग- रूप आैर शक्ल में लेकर आए हैं कुछ चुनिंदा कहानीकार, जिन्हें बच्चों को कहानियां सुनाने का विशेष शौक है। कुछ की कहानियों में रहस्य विशेष तौर पर शामिल होता है तो कुछ की कहानियों में लगभग हर तरह के विषय।
सच तो यह है कि कहानी सुनने- सुनाने का यह सिलसिला नया नहीं है। बात सिर्फ इतनी है कि हमने कहानियां सुनने- सुनाने की प्रवृत्ति आैर संस्कृति को अपनी रोजमर्रा की जिंदगी से दूर कर दिया है। हमारे ही घरों में दादा- दादी, नाना- नानी, मां- पिता से बच्चों की होने वाली रोजाना की बातचीत की ही संस्कृति तो कहानी का रूप अख्तियार करती है।
नए दौर के स्टोरी सेशन में कहानियां ही सुनाई जाती हैं। बच्चों को कहानियां सुनाने वाले काबुलीवाला के नाम से प्रसिद्ध थिएटर कलाकार कमल प्रूथी कहते हैं, मेरी कहानियों में रोमांच, अभिनय, धुन, वास्तविकता, स्वाद, ईष्या, सवाल, जवाब, भावों की भरमार आैर उत्सुकता रहती है। बच्चे कहानी सुनने के दौरान कहानियां बुन भी रहे होते हैं आैर ये कहानी सुनाने का सबसे मजेदार हिस्सा है। मैं उन छोटी बुनी कहानियों के अंश अपने झोले में भर लेता हूं आैर अपनी बड़ी कहानी का हिस्सा बना लेता हूं। इधर की बात उधर, उधर की बात इधर, ये भी गपशप के तौर पर सफर करने वाली कहानियां ही हैं। कहानीवाचक के तौर पर मैं कहानियां बनाता ही नहीं, बल्कि बटोरता भी चलता हूं। पिछले शो में लगभग 50 बच्चे कहानी खत्म होते- होते मुझ पर टूट पड़े आैर उत्सुकता से मेरे झोले के अंदर तांका- झांकी करने लगे। मैं काबुलीवाला के तौर पर बच्चों के सामने जाता हूं, एक अलग कॉस्ट¬ूम आैर पगड़ी पहनकर ताकि बच्चों को महसूस हो कि मैं कहानियां ही सुनाता हूं।
सच कहा जाए तो कहानी सुनना एक अनुशासन भी है। सुनने का रोमांच, कहानी को अपनी अनोखी विजुअलाइजेशन से अपने अनोखे अंदाज में घटते देख पाने का रोमांच। दरअसल बच्चे हमेशा कुछ कहना चाहते हैं। हम ही कई बार चिढ़ कर उन्हें चुप करा देते हैं, जो कि बिल्कुल भी ठीक नहीं है। बच्चों की दुनिया आैर उनकी बातचीत का हिस्सा बनना अपने आपमें कम रोमांचक नहीं है। कहानी सुनने आैर सुनाने से कम से कम बच्चों के मन की जिज्ञासा तो बढ़ती है। कुछ बच्चों को एक ही कहानी को बार- बार सुनना अच्छा लगता है। इसका अर्थ यह है कि उसे उस कहानी ने प्रभावित किया है। कहानी पसंद करने वाले बच्चों के माता- पिता को नई तरह की कहानियां सुनानी चाहिए। उन बच्चों की ऊर्जा को सही दिशा में निवेश करना चाहिए। दरअसल कहानी सुनाने की प्रक्रिया घर से ही शुरू होनी चाहिए। इस तरह से बच्चे आैर घर के अन्य लोगों के बीच एक संवाद भी स्थापित होता है। काबुलीवाला कमल प्रूथी कहते हैं, माता- पिता के अलावा, दूसरी मुख्य भूमिका स्कूलों की होती है। स्कूलों में स्टोरीटेलिंग सेशन का आयोजन किया जाने लगा है, हालांकि यह ट्रेंड अभी बिल्कुल नया है। कुछ स्कूल अपने शिक्षकों को स्टोरीटेलिंग में प्रशिक्षित भी करना चाहते हैं। लेकिन कइयों को अभी भी समझ में नहीं आ रहा है कि इसकी शुरुआत कैसे की जाए।